आगरा/प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका में हर वर्ष करोड़ों पन्नों की अनावश्यक खपत हो रही है। यदि अदालतों में लीगल (फुलस्केप) पेपर की जगह ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग लागू कर दी जाए तो न केवल करोड़ों पन्नों की बचत होगी, बल्कि हजारों पेड़ों की कटाई, पानी और ऊर्जा की खपत के साथ सरकारी धन की भी बड़ी बचत संभव है। यह दावा वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद् के.सी. जैन ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर किया है।
उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजे प्रतिवेदन में मांग की है कि हाईकोर्ट और प्रदेश के सभी अधीनस्थ दीवानी एवं फौजदारी न्यायालयों में ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग अनिवार्य की जाए। उनका कहना है कि यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और न्यायिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम होगा।
आरटीआई ने खोली फैसले की परतें
आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, 5 नवंबर 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने ए-4 पेपर अपनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद 28 जनवरी 2021 को नियम समिति ने आवश्यक संशोधनों की सिफारिश की। फुल कोर्ट ने भी इसे मंजूरी दी और 29 मई 2021 को अधिसूचना जारी कर राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया।
यही नहीं, इस व्यवस्था को लागू करने के लिए प्रशासनिक आदेश का मसौदा भी तैयार कर लिया गया था। लेकिन 10 मार्च 2022 को प्रशासनिक समिति ने अपना ही निर्णय पलट दिया। इसके बाद 10 अगस्त 2022 को नियम समिति ने दोबारा पुराने लीगल (फुलस्केप) पेपर की व्यवस्था लागू करने का निर्णय ले लिया।
के.सी. जैन का सवाल है कि जब पूरी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और नियमों में संशोधन तक कर दिए गए थे, तब आखिर किस आधार पर यह फैसला वापस लिया गया।
आंकड़े बताते हैं कागज की विशाल खपत
प्रतिवेदन के अनुसार, उत्तर प्रदेश के जिला न्यायालयों में वर्तमान में 1.19 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इनमें 18.73 लाख दीवानी और 1 करोड़ से अधिक फौजदारी मामले शामिल हैं। हर महीने करीब 8.5 लाख नए मुकदमे दर्ज होते हैं।
वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट में 12.29 लाख से अधिक मामले लंबित हैं तथा प्रतिवर्ष लगभग चार लाख नए मुकदमे दायर किए जाते हैं। इन सभी मामलों में याचिकाएं, शपथपत्र, आदेश, प्रतिलिपियां और अन्य दस्तावेजों के लिए भारी मात्रा में कागज का उपयोग होता है। अधिवक्ता जैन का कहना है कि यदि ए-4 पेपर पर दोनों तरफ प्रिंटिंग लागू हो जाए तो हर वर्ष करोड़ों पन्नों की बचत संभव है।
ई-कोर्ट की दिशा में पुरानी व्यवस्था क्यों?
प्रतिवेदन में कहा गया है कि देशभर में न्यायपालिका ई-फाइलिंग, ई-कोर्ट, डिजिटल रिकॉर्ड और पेपरलेस कार्यप्रणाली की ओर तेजी से बढ़ रही है। ऐसे समय में केवल एक तरफ प्रिंटिंग और बड़े आकार के कागज का उपयोग न्यायिक आधुनिकीकरण की भावना के अनुरूप नहीं है।
ए-4 आकार का कागज अंतरराष्ट्रीय मानक है। इससे स्कैनिंग और डिजिटाइजेशन आसान होता है, रिकॉर्ड रखने के लिए कम जगह चाहिए, फोटोकॉपी और परिवहन का खर्च घटता है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
सुप्रीम कोर्ट में पहले से लागू व्यवस्था
के.सी. जैन ने अपने प्रतिवेदन में उल्लेख किया है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय वर्षों से ए-4 आकार के कागज पर दोनों तरफ प्रिंटिंग की व्यवस्था अपना रहा है। देश के अधिकांश उच्च न्यायालयों में भी यही व्यवस्था लागू है और इससे न्यायिक कार्य में कोई बाधा नहीं आई है।
सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है याचिका
उन्होंने बताया कि इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में उनकी जनहित याचिका (रिट पिटीशन सिविल संख्या-324/2024) लंबित है। इस पर 8 जुलाई 2024 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने नोटिस जारी किया था। मामले की अगली सुनवाई की कंप्यूटर जनित तिथि 17 जुलाई 2026 निर्धारित है।
के.सी. जैन बोले
“यह सिर्फ कागज बदलने का मामला नहीं है। यह न्यायपालिका को अधिक आधुनिक, पर्यावरण-अनुकूल और किफायती बनाने का अवसर है। यदि उत्तर प्रदेश की सभी अदालतों में ए-4 पेपर पर दोनों तरफ प्रिंटिंग लागू कर दी जाए तो हर वर्ष करोड़ों पन्नों की बचत होगी, हजारों पेड़ कटने से बचेंगे, सरकारी खर्च घटेगा और ई-कोर्ट व्यवस्था को वास्तविक मजबूती मिलेगी।”

