विशेष रिपोर्ट: शिल्पग्राम, आगरा
ताजनगरी आगरा के वार्षिक कैलेंडर का सबसे प्रतीक्षित और रंगारंग उत्सव ‘ताज महोत्सव’ एक बार फिर अपनी पूरी भव्यता के साथ शुरू होने के लिए तैयार है। आगरा के शिल्पग्राम परिसर में आयोजित होने वाले इस 10 दिवसीय सांस्कृतिक महाकुंभ को लेकर प्रशासनिक और कलात्मक तैयारियां अंतिम चरण में हैं। लेकिन इस साल का महोत्सव पिछले कई दशकों के इतिहास से बिल्कुल अलग और बेहद खास होने जा रहा है। हर साल जहां इस मंच की मुख्य लाइमलाइट मुंबई और दिल्ली से आने वाले बड़े बॉलीवुड गायकों और पॉप स्टार्स के इर्द-गिर्द सिमटी रहती थी, वहीं इस बार संस्कृति विभाग और जिला प्रशासन ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया है। इस वर्ष की सांस्कृतिक संध्याओं में आगरा और पूरे ब्रज क्षेत्र के स्थानीय लोक संगीतकारों, सूफी गायकों और शास्त्रीय घरानों के कलाकारों को मुख्य मंच (Main Stage) पर विशेष स्लॉट और प्राथमिकता दी जाएगी।
बदलाव की बयार: ‘ग्लैमर’ से ज्यादा ‘जड़ों’ की ओर वापसी
अधिकारियों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस बदलाव के पीछे मुख्य सोच उत्सव को उसके मूल स्वरूप में वापस लाना है। ताज महोत्सव की शुरुआत मुख्य रूप से भारत की समृद्ध लोक कला, हस्तशिल्प और संगीत को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। हालांकि, समय के साथ इस पर बॉलीवुड का व्यावसायिक ग्लैमर हावी होता गया, जिससे स्थानीय कलाकारों को या तो मौका नहीं मिलता था या उन्हें केवल शुरुआती ‘कर्टेन रेज़र’ प्रस्तुतियों तक सीमित कर दिया जाता था।
संस्कृति विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “आगरा, मथुरा और अलीगढ़ का यह पूरा ब्रज क्षेत्र संगीत के लिहाज से बेहद समृद्ध है। यहां एक से बढ़कर एक सूफी और लोक गायक हैं, जिनकी आवाज में जादू है, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय स्तर का मंच नहीं मिल पाता। इस बार हमने तय किया है कि मुख्य शाम की शुरुआत ही हमारे स्थानीय कलाकारों के बड़े और विस्तृत स्लॉट्स से होगी, ताकि दुनिया भर से आने वाले पर्यटक हमारी वास्तविक लोक संस्कृति से रूबरू हो सकें।”
अमीर खुसरो के कलाम और ब्रज के रसिया का अनूठा संगम
इस बार के महोत्सव की संगीत रूपरेखा को बेहद खूबसूरती से तैयार किया गया है। उत्सव की सांस्कृतिक संध्याओं की शुरुआत हजरत अमीर खुसरो की सूफी बंदिशों और कव्वालियों से होगी, जो आगरा की गंगा-जमुनी तहजीब को बयां करती हैं। इसके ठीक बाद मंच पर ब्रज के पारंपरिक रसिया, होली गीत, और चरकुला नृत्य के साथ गाए जाने वाले लोकगीतों की धूम मचेगी।
आगरा के ही एक जाने-माने सूफी गायक, जो पिछले कई वर्षों से सूफियाना कलाम पढ़ रहे हैं, ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा, “यह हमारे जैसे कलाकारों के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। शिल्पग्राम का मंच बहुत प्रतिष्ठित है। जब यहां विदेशी सैलानियों और देश भर से आए कला प्रेमियों के सामने हम अपनी मिट्टी का संगीत गाएंगे, तो उससे हमारी कला को एक नई जिंदगी मिलेगी। स्थानीय कलाकारों को मुख्य समय (Prime Time) देना एक ऐतिहासिक कदम है।”
कड़े ऑडिशन से छंट कर आ रहा है ताजनगरी का असली हुनर
स्थानीय कलाकारों को मौका देने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है। इसके लिए संस्कृति विभाग की देखरेख में आगरा के सूरसदन प्रेक्षागृह में एक उच्च स्तरीय जूरी द्वारा बाकायदा कड़े ऑडिशन आयोजित किए जा रहे हैं। इन ऑडिशंस में शहर के युवा कॉलेज बैंड्स, शास्त्रीय संगीत के छात्रों, पारंपरिक कव्वाली टोलियों और देहाती लोक कलाकारों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है।
जूरी के सदस्यों का कहना है कि ऑडिशन के दौरान आगरा का जो हुनर निकलकर सामने आया है, उसने सभी को हैरान कर दिया है। शहर की तंग गलियों और गांवों में ऐसे-ऐसे फनकार छुपे हुए हैं, जो बड़े-बड़े स्थापित गायकों को टक्कर दे सकते हैं। इस प्रक्रिया से न केवल वरिष्ठ गुणी कलाकारों को मंच मिल रहा है, बल्कि शहर के उभरते हुए युवा संगीतकारों में भी भारी उत्साह देखा जा रहा है।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
इस नई पहल का असर केवल संगीत तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा फायदा स्थानीय पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी मिलने की उम्मीद है। जब महोत्सव में विशुद्ध ब्रज और सूफी संगीत का आयोजन होगा, तो वह आगरा आने वाले विदेशी और घरेलू पर्यटकों के लिए एक बिल्कुल अनूठा और प्रामाणिक (Authentic) अनुभव होगा। पर्यटक अक्सर वही देखना और सुनना पसंद करते हैं, जो उस शहर की अपनी मिट्टी की पहचान हो।
इसके साथ ही, स्थानीय कलाकारों को मुख्य मंच मिलने से उन्हें उचित मानदेय और रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। इससे पहले बजट का एक बड़ा हिस्सा बाहरी सेलिब्रिटीज की फीस और उनके वीआईपी दौरों पर खर्च हो जाता था, लेकिन अब वही संसाधन स्थानीय कला और कलाकारों के उत्थान में काम आएंगे।
निष्कर्ष: कला और संस्कृति की जीत
ताज महोत्सव का यह नया रूप इस बात का संकेत है कि अब सांस्कृतिक आयोजनों में ‘स्टार पावर’ से ज्यादा ‘कंटेंट’ और ‘जड़ों’ को अहमियत दी जाने लगी है। शिल्पग्राम का यह खुला आसमान, ढोलक की थाप, सारंगी की गूंज और ब्रज की भाषा की मिठास के साथ एक नए इतिहास का गवाह बनने के लिए तैयार है। जब इस बार महोत्सव के मंच से सूफी और लोक संगीत की तान उठेगी, तो वह सीधे श्रोताओं की रूह में उतरेगी और ताजनगरी की इस संगीत यात्रा को हमेशा-हमेशा के लिए अमर बना देगी।

