आगरा घराने की शास्त्रीय विरासत को बचाने के लिए आगे आई तानसेन की धरती की नई पीढ़ी

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विशेष रिपोर्ट: पुरानी मंडी, आगरा

ताजमहल की प्राचीर से टकराकर बहने वाली यमुना की ठंडी हवाएं सिर्फ इतिहास की गवाह नहीं हैं, बल्कि वे गवाह हैं उस सुरमई गूंज की जिसे दुनिया ‘आगरा घराना’ के नाम से जानती है। एक समय था जब इस शहर की गलियों से गुजरते हुए किसी न किसी घर से तानपुरा, सारंगी की आवाज और किसी उस्ताद की ‘नोम-तोम’ के आलाप की तान सुनाई दे ही जाती थी। लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़, पाश्चात्य संगीत के बढ़ते प्रभाव और रियाज की घटती संस्कृति के कारण यह महान शास्त्रीय परंपरा कुछ समय के लिए नेपथ्य में चली गई थी। मगर अब ताजनगरी के संगीत परिदृश्य से एक बेहद सुखद और उम्मीद जगाने वाली खबर आ रही है। आगरा घराने के गौरवशाली अतीत को सहेजने और उसे फिर से जन-जन तक पहुँचाने के लिए शहर के वरिष्ठ उस्तादों के मार्गदर्शन में युवा मौसिकारों (संगीतकारों) की एक पूरी नई पीढ़ी एकजुट हो गई है।

आगरा घराना: तानसेन से लेकर उस्ताद फैयाज खान तक का सफर

इस नई मुहिम को समझने के लिए सबसे पहले आगरा घराने की गहराई को समझना जरूरी है। यह घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित घरानों में से एक है। इसकी जड़ें मुगल काल में महाकवि तानसेन के दामाद हाजी सुजान खान से जुड़ती हैं। बाद के दौर में इस घराने को जो वैश्विक पहचान और बुलंदी मिली, उसका श्रेय ‘आफ़ताब-ए-मशकी’ (संगीत का सूर्य) उस्ताद फैयाज खान को जाता है। उनकी गायकी की दमदार मखमली आवाज, ‘ध्रुपद-धमार’ का अनूठा मिश्रण और बंदिशों को पेश करने का खास ‘आगरा अंदाज’ पूरी दुनिया में सराहा गया।

पुरानी मंडी स्थित संगीत के एक वरिष्ठ जानकार ने भावुक होते हुए बताया, “आगरा घराने की गायकी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक कठोर साधना है। इसमें सीने की आवाज से गाए जाने वाले आलाप और लयकारी की जो पेचीदगियां हैं, वे दुनिया के किसी और संगीत में नहीं मिलतीं। इस विरासत को मरते हुए देखना हमारे लिए असहनीय था, लेकिन आज के बच्चों का उत्साह देखकर मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं।”

स्कूल-कॉलेजों से होगी शुरुआत: शास्त्रीय संगीत का लोकतंत्रीकरण

इस नई मुहिम की सबसे बड़ी रणनीति यह है कि संगीत को केवल चुनिंदा महफिलों या बड़े ऑडिटोरियम से निकालकर आम बच्चों और युवाओं तक पहुँचाया जाए। इसके लिए शहर की एक प्रमुख सांस्कृतिक संस्था और युवा संगीतकारों ने मिलकर एक विस्तृत योजना तैयार की है। इस योजना के तहत आगरा और इसके ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी व निजी स्कूलों में मुफ्त ‘शास्त्रीय संगीत कार्यशालाएं’ (Workshops) आयोजित की जा रही हैं।

युवा संगीतकारों की टोली स्कूलों में जाकर बच्चों को भारी-भरकम तकनीकी शब्दों के बजाय बेहद सरल और रोचक तरीके से सात सुरों (सा, रे, गा, मा…) की ताकत समझा रही है। उन्हें बताया जा रहा है कि कैसे सुबह का राग ‘भैरव’ उनके मन को शांत कर सकता है और कैसे शाम का राग ‘यमन’ उनकी एकाग्रता को बढ़ा सकता है। इस तरह से बच्चों के मन में बचपन से ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति सम्मान और रुचि पैदा की जा रही है।

गुरु-शिष्य परंपरा का आधुनिक रूप

आज के डिजिटल और तेज रफ्तार दौर में पारंपरिक ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। पुरानी पद्धतियों के अनुसार शिष्य को वर्षों गुरु के घर रहकर सेवा और रियाज करना पड़ता था। इस चुनौती का हल निकालते हुए आगरा के युवा उस्तादों ने इस परंपरा को आधुनिक रूप दिया है। अब शहर के विभिन्न हिस्सों में ‘कम्युनिटी रियाज सेंटर्स’ खोले जा रहे हैं।

इन सेंटर्स पर हर सप्ताहांत (Weekend) को वरिष्ठ गुरु बैठते हैं और शहर के किसी भी कोने से आने वाला छात्र वहां बैठकर घंटों तानपूरे के साथ रियाज कर सकता है। इसके लिए कोई मोटी फीस नहीं ली जाती। यहाँ तक कि जो बच्चे तानपुरा या हरमोनियम खरीदने में असमर्थ हैं, उन्हें संस्था की तरफ से वाद्य यंत्र उपलब्ध कराए जा रहे हैं। सोशल मीडिया और जूम (Zoom) जैसे ऐप्स का इस्तेमाल उन छात्रों को सिखाने के लिए किया जा रहा है जो देश-विदेश में रहकर आगरा घराने की बंदिशें सीखना चाहते हैं।

वेस्टर्न म्यूजिक और फ्यूजन के बीच अपनी पहचान की जंग

एक तरफ जहाँ युवा संगीतकार इस विरासत को बचाने में जुटे हैं, वहीं उनके सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। आज का युवा रैप, पॉप और रील्स के छोटे संगीत प्रारूपों (Short-form music) की तरफ तेजी से भाग रहा है। शास्त्रीय संगीत जिसमें धैर्य, घंटों के रियाज और साधना की जरूरत होती है, उसे आज के ‘इंस्टेंट’ (तुरंत) के दौर में प्रासंगिक बनाए रखना एक कठिन काम है।

इस पर बात करते हुए आगरा घराने की विधा सीख रही एक युवा शास्त्रीय गायिका ने कहा, “हमें वेस्टर्न या पॉप संगीत से कोई बैर नहीं है, संगीत के हर रूप का अपना स्थान है। लेकिन हम चाहते हैं कि युवाओं को यह पता हो कि बेस (Base) क्या है। अगर आपका शास्त्रीय आधार मजबूत है, तो आप दुनिया का कोई भी संगीत बड़ी आसानी से गा सकते हैं। हम कड़े शास्त्रीय नियमों को बिना तोड़े, उन्हें आज के युवाओं के सुनने लायक और सुगम बनाकर पेश करने का प्रयास कर रहे हैं।”

निष्कर्ष: एक नई सुबह की आहट

ताजनगरी आगरा में शुरू हुई सुरों की यह नई जंग सिर्फ संगीत को बचाने की जंग नहीं है, बल्कि यह इस शहर की आत्मा और पहचान को जिंदा रखने की कवायद है। नई पीढ़ी का यह कदम यह साबित करता है कि जड़ें भले ही कुछ समय के लिए सूखी दिखाई दें, लेकिन अगर उन्हें सही समय पर नई पीढ़ी के उत्साह और सही मार्गदर्शन का पानी मिले, तो वे फिर से हरी-भरी हो सकती हैं। उस्ताद फैयाज खान की इस पावन धरती पर युवा कलावंतों के गले से फूटते ये नए सुर इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि आगरा घराने की तान कभी खामोश नहीं होगी।

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