आगरा के सुप्रसिद्ध ‘जूता उद्योग’ (Footwear Industry) का वित्तीय संकट और एमएसएमई (MSME) लोन नीतियां

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शीर्षक: कच्चे माल की महंगाई और वर्किंग कैपिटल की किल्लत: आगरा के जूता उद्योग को उबारने के लिए वित्तीय पैकेज की मांग

विशेष आर्थिक संवाददाता, आगरा

ताजनगरी आगरा केवल देश का एक प्रमुख पर्यटन स्थल ही नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे बड़े फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग हब्स में से एक है। देश में बनने वाले कुल चमड़े और गैर-चमड़े (Non-leather) के जूतों का लगभग 65% से 70% हिस्सा अकेले आगरा की फैक्ट्रियों और घरेलू इकाइयों से बनकर तैयार होता है। इस उद्योग से शहर के करीब 4 लाख से अधिक परिवारों की आजीविका सीधे और परोक्ष रूप से जुड़ी हुई है। लेकिन वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में, आगरा का यह ऐतिहासिक और पारंपरिक फुटवियर सेक्टर एक गंभीर वित्तीय संकट (Financial Crunch) और नकदी की कमी (Liquidity Crisis) से जूझ रहा है। कच्चे माल की आसमान छूती कीमतें, निर्यात (Exports) में आई गिरावट और स्थानीय सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए बैंकों से वर्किंग कैपिटल लोन मिलने में आ रही जटिलताओं ने इस पूरे उद्योग की वित्तीय कमर तोड़ दी है।

नकदी का संकट: क्यों चरमरा रहा है वर्किंग कैपिटल?

जूता उद्योग से जुड़े वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस को सुचारू रूप से चलाने के लिए ‘वर्किंग कैपिटल’ (Working Capital) यानी दैनिक परिचालन पूंजी का होना सबसे अनिवार्य शर्त है। आगरा में जूतों का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें कच्चा माल खरीदने से लेकर, जूतों की सिलाई, सोल फिटिंग, फिनिशिंग और पैकेजिंग के बाद बाजार में माल बिकने तक कम से कम 90 से 120 दिनों का समय लगता है।

समस्या यह है कि पिछले कुछ समय से बड़े खरीदारों और कॉर्पोरेट रिटेलर्स द्वारा भुगतान (Payment Cycle) में भारी देरी की जा रही है। पहले जहां भुगतान 30 से 45 दिनों में आ जाता था, वहीं अब यह बढ़कर 90 से 120 दिन हो गया है। इसके विपरीत, कच्चे माल (चमड़ा, सिंथेटिक लेदर, केमिकल और सोल) के सप्लायर्स अब नकद या बहुत कम समय की उधारी पर माल दे रहे हैं। इस बेमेल पेमेंट साइकिल के कारण छोटी और कुटीर निर्माण इकाइयों के पास नकदी पूरी तरह खत्म हो गई है, जिससे वे नए ऑर्डर लेने और कारीगरों की साप्ताहिक मजदूरी चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं।

एमएसएमई (MSME) लोन नीतियां और बैंकों का अड़ियल रवैया

भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए ‘मुद्रा लोन’, ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेस’ (CGTMSE) और ‘मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना’ जैसी कई महत्वाकांक्षी लोन योजनाओं की घोषणा की है। इन योजनाओं के तहत बिना किसी कोलैटरल (बिना गारंटी या बिना कुछ गिरवी रखे) के लोन देने का प्रावधान है।

लेकिन आगरा के जूता कारोबारियों की जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों से बिल्कुल जुदा है। आगरा फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों के मुताबिक, जब एक छोटा उद्यमी बैंक की शाखा में लोन के लिए जाता है, तो बैंक अधिकारी कागजी जटिलताओं का हवाला देकर और सिबिल स्कोर (CIBIL Score) की सख्त शर्तों को सामने रखकर लोन आवेदन को हफ्तों तक लटकाए रखते हैं। बैंकों द्वारा सिबिल स्कोर में मामूली गिरावट या पिछले किसी छोटे लोन के तकनीकी कारणों से पेंडिंग होने पर भी वर्किंग कैपिटल लोन को रिजेक्ट कर दिया जाता है। इस अड़ियल वित्तीय रवैये के कारण छोटे कारखानेदार बैंकों के बजाय स्थानीय साहूकारों और अनौपचारिक वित्तीय स्रोतों से 24% से 36% की अत्यधिक ब्याज दरों पर कर्ज लेने को मजबूर हैं, जो उन्हें कर्ज के एक अंतहीन जाल (Debt Trap) में धकेल रहा है।

निर्यात (Exports) बाजार में मंदी का वित्तीय झटका

आगरा का जूता उद्योग केवल घरेलू बाजार पर निर्भर नहीं है; यहाँ बने जूते यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाते हैं। लेकिन वैश्विक स्तर पर चल रही आर्थिक सुस्ती, भू-राजनीतिक तनाव (जैसे लाल सागर संकट के कारण बढ़ा हुआ समुद्री माल भाड़ा) और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्रास्फीति (Inflation) के कारण विदेशी खरीदारों ने अपने ऑर्डर्स में 30% तक की कटौती कर दी है।

निर्यात में आई इस गिरावट का सीधा असर आगरा की बड़ी और आधुनिक एक्सपोर्ट इकाइयों के टर्नओवर पर पड़ा है। एक्सपोर्ट घटने से इन बड़ी कंपनियों ने स्थानीय स्तर पर छोटे जॉब-वर्कर्स (जो घरों में जूतों के ऊपरी हिस्से यानी अपर की सिलाई करते हैं) को काम देना बंद या कम कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, वित्तीय तरलता (Financial Liquidity) का यह संकट पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर बैठे गरीब कारीगरों तक पहुंच गया है, जिससे बाजार में कुल उपभोग और मांग भी प्रभावित हो रही है।

बजट 2026 और सरकार से वित्तीय पैकेज की उम्मीदें

इस गंभीर आर्थिक परिस्थिति से उबरने के लिए आगरा के उद्योगपतियों और चैंबर ऑफ कॉमर्स ने सरकार के सामने एक विशेष वित्तीय पुनरुद्धार पैकेज (Financial Revival Package) की मांग रखी है। कारोबारियों का कहना है कि आगरा के जूता उद्योग को बचाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने अत्यंत आवश्यक हैं:

  • लोन की आसान री-स्ट्रक्चरिंग: जिन एमएसएमई इकाइयों के खाते पेमेंट में देरी के कारण एनपीए (NPA) होने की कगार पर हैं, उन्हें बिना किसी अतिरिक्त जुर्माने के लोन री-स्ट्रक्चरिंग की सुविधा दी जाए।
  • ब्याज सबवेंशन (Interest Subvention): छोटे कारीगरों और नए स्टार्टअप्स के लिए लोन पर कम से कम 3% से 5% की ब्याज छूट (Interest Subsidy) दी जानी चाहिए।
  • फुटवियर पार्क और कॉमन फैसिलिटी सेंटर: सरकार आगरा में एक आधुनिक फुटवियर क्लस्टर विकसित करे, जहां छोटे व्यापारियों को सस्ती दरों पर आधुनिक मशीनें और डिजाइनिंग टूल्स मिल सकें, जिससे उनकी उत्पादन लागत (Production Cost) कम हो सके और वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।

निष्कर्ष: आर्थिक पहिये को गति देने की जरूरत

आगरा का जूता उद्योग शहर की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ है। यदि इस स्तंभ को समय रहते वित्तीय ऑक्सीजन नहीं दी गई, तो यह न केवल शहर के टर्नओवर को प्रभावित करेगा बल्कि बड़े पैमाने पर बेरोजगारी को भी जन्म देगा। वित्तीय संस्थानों, बैंकों और प्रशासनिक नीति-निर्माताओं को अपनी फाइलों से बाहर निकलकर आगरा के इस पारंपरिक हुनर को बचाने के लिए लचीली और व्यावहारिक लोन नीतियां अपनानी होंगी, ताकि ताजनगरी के इस आर्थिक पहिये को दोबारा पूरी रफ्तार से घुमाया जा सके।

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