आगरा नगर निगम में ‘मेयर बनाम कमिश्नर’ संग्राम—जब खाली कुर्सियों के बीच जनप्रतिनिधि ने खोला मोर्चा

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शीर्षक: नौकरशाही बनाम लोकतंत्र: मेयर हेमलता दिवाकर और नगर आयुक्त की रार पहुंची लखनऊ; सदन के बहिष्कार से सियासी भूचाल

विशेष राजनीतिक संवाददाता, ताजनगरी (आगरा)

देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहने वाली ताजनगरी आगरा में इन दिनों विकास योजनाओं से ज्यादा स्थानीय प्रशासन की आंतरिक सिरफुटौव्वल और राजनीतिक दंगल चर्चा का विषय बना हुआ है। आगरा नगर निगम (Agra Municipal Corporation), जिसे शहर के विकास का इंजन होना चाहिए था, वह इस समय नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच वर्चस्व की जंग का अखाड़ा बन चुका है। नगर निगम के इतिहास में हाल ही में एक ऐसी अभूतपूर्व और हैरान कर देने वाली स्थिति देखने को मिली, जिसने न केवल प्रशासनिक ढांचे की कमियों को उजागर किया, बल्कि उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति में भी एक बड़ा भूचाल ला दिया है । भाजपा की मेयर हेमलता दिवाकर द्वारा बुलाई गई नगर निगम सदन की बेहद महत्वपूर्ण बैठक का खुद नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) अंकित खंडेलवाल (IAS) समेत निगम के सभी छोटे-बड़े अधिकारियों ने पूरी तरह से सामूहिक बहिष्कार कर दिया। खाली कुर्सियों और अधिकारियों की गैर-मौजूदगी के बीच अकेली बैठीं मेयर का दर्द सबके सामने छलक पड़ा, जिसके बाद यह प्रशासनिक रार अब सीधे सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दरबार तक जा पहुंची है।

सदन का अंकगणित: भाजपा का प्रचंड बहुमत फिर भी लाचार

इस पूरे राजनीतिक विवाद की गहराई को समझने के लिए सबसे पहले आगरा नगर निगम के सदन की राजनीतिक बनावट और सीटों के समीकरण को देखना जरूरी है । कुल 100 वार्डों वाले इस सदन में भारतीय जनता पार्टी बेहद मजबूत स्थिति में है :

  • सत्तारूढ़ दल (सरकार): भाजपा (58 सीटें)
  • मुख्य विपक्षी दल: बहुजन समाज पार्टी (27 सीटें)
  • अन्य दल: समाजवादी पार्टी (3 सीटें), कांग्रेस (1 सीट), और निर्दलीय (11 सीटें)

नियमों के मुताबिक, 58 पार्षदों और स्वयं मेयर के साथ भाजपा के पास सदन चलाने और किसी भी नीति को पास कराने के लिए स्पष्ट बहुमत मौजूद है । इसके बावजूद, अधिकारियों के कथित अड़ियल और ‘निरंकुश’ रवैये के कारण सदन की कार्यवाही ठप पड़ी है। इस अभूतपूर्व बहिष्कार की शाम, बैठक की कार्रवाई समाप्त होने तक करीब 72 सत्तापक्ष और विपक्ष के पार्षदों ने एकजुट होकर नगर आयुक्त के खिलाफ एक सुर में ‘निंदा प्रस्ताव’ पर हस्ताक्षर किए और उसे पारित किया। यह इस बात का प्रमाण है कि अधिकारियों के रवैये से केवल मेयर ही नहीं, बल्कि विपक्ष के पार्षद भी बेहद नाराज हैं।

विवाद की असल जड़: ₹9 करोड़ का वित्तीय घपला और फाइलों पर धूल

आखिर रातों-रात ऐसा क्या हुआ कि अधिकारियों ने चुनी हुई सरकार के सदन का ही बहिष्कार कर दिया? राजनीतिक और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस पूरे संग्राम के पीछे करोड़ों रुपये के बजट का आवंटन और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। मेयर हेमलता दिवाकर ने सीधे तौर पर नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल पर नगर निगम को लगभग 9 करोड़ रुपये की वित्तीय हानि पहुँचाने और विकास कार्यों में जानबूझकर रोड़े अटकाने का गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री को लिखित शिकायत भेजी है।

दूसरी तरफ, नगर आयुक्त ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे ‘झूठ का पुलिंदा’ करार दिया है। अधिकारियों का तर्क है कि मेयर द्वारा बुलाई गई बैठक का कोई स्पष्ट या पहले से तय एजेंडा जारी नहीं किया गया था और उन्हें बहुत ही अंतिम समय में (शॉर्ट नोटिस पर) बैठक की सूचना दी गई, जिसके कारण उनका आना संभव नहीं था।

इस प्रशासनिक रस्साकशी का सबसे बड़ा खामियाजा आगरा की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। सदन की बैठकों में विपक्ष और सत्तापक्ष के पार्षदों ने सवाल उठाया कि 140 करोड़ रुपये की चौदहवें और पंद्रहवें वित्त आयोग (FFC) की फाइलें प्रशासनिक कमरों में धूल फांक रही हैं। अगर समय रहते इन फाइलों पर स्वीकृति नहीं मिली, तो यह विशाल बजट लैप्स (वापस) हो जाएगा, जिससे शहर में होने वाले सीवरेज, ड्रेनेज और सड़कों के काम पूरी तरह ठप हो जाएंगे।

‘स्मार्ट सिटी’ बनाम जमीनी हकीकत की राजनीति

आगरा नगर निगम का यह आंतरिक विवाद एक ऐसे समय पर सामने आया है जब शहर में ‘स्वच्छ सर्वेक्षण 2026’ को लेकर अभियान तेज किया जा रहा है। मेयर हेमलता दिवाकर लगातार व्यापारियों और नागरिक संगठनों के साथ बैठकें कर रही हैं ताकि साल 2023 में 85वें स्थान पर रहने वाले आगरा को देश का नंबर-1 स्वच्छ शहर बनाया जा सके।

लेकिन हकीकत यह है कि जब तक जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों (Bureaucracy) के बीच पटरी नहीं बैठेगी, तब तक शहर को वास्तविक रूप से स्मार्ट बना पाना मुमकिन नहीं है। विपक्ष के पार्षदों, विशेष रूप से बसपा पार्षद दल के नेता का कहना है कि शहर के भीतरी और ग्रामीण क्षेत्रों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन वाहन नहीं पहुंच रहे हैं और नालों की सफाई न होने से मानसून से पहले ही जलभराव का खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में अधिकारियों का सदन से गायब रहना सीधे तौर पर आगरा की जनता का अपमान है।

निष्कर्ष: लखनऊ के फैसले पर टिकीं ताजनगरी की निगाहें

आगरा नगर निगम का यह ‘मेयर बनाम कमिश्नर’ विवाद अब केवल एक स्थानीय प्रशासनिक खींचतान नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक बड़ा राजनीतिक रूप अख्तियार कर लिया है। भाजपा के ही कुछ स्थानीय विधायकों ने अंदरूनी तौर पर मेयर की इस शिकायत का समर्थन किया है, जबकि कुछ धड़े इस विवाद को शांत कराने की कोशिश में जुटे हैं।

सदन द्वारा पारित निंदा प्रस्ताव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास पहुंची 9 करोड़ के घपले की फाइल के बाद अब सबकी निगाहें लखनऊ से आने वाले आदेश पर टिकी हुई हैं। क्या शासन स्तर पर नगर आयुक्त का तबादला किया जाएगा या फिर मेयर को अपनी ही सरकार के अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाने की नसीहत मिलेगी? इसका फैसला जो भी हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने ताजनगरी के नगर निगम प्रशासन की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान जरूर लगा दिया है।

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