विशेष रिपोर्ट: रुनकता, आगरा
आगरा और मथुरा के बीच स्थित यमुना किनारे का वह पावन स्थल, जिसे दुनिया ‘सूरकुटी’ (सीही) के नाम से जानती है, कल सुरों के एक ऐसे सागर में सराबोर था जिसने कलयुग में द्वापर युग की याद दिला दी। हिंदी साहित्य के सूर्य और ‘अष्टछाप’ के अग्रणी कवि महाकवि सूरदास की यह कर्मस्थली एक बार फिर उनके द्वारा रचित पदों और रागों से जीवंत हो उठी। वार्षिक ‘सूर-संगीत अंजलि’ समारोह के अवसर पर देश भर से आए शास्त्रीय गायकों, कीर्तनकारों और साहित्यकारों ने भाग लिया, जिससे ताजनगरी का सांस्कृतिक वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
ऐतिहासिक महत्व: जहाँ ‘सुर’ को मिले ‘श्याम’
आगरा जिले के रुनकता क्षेत्र में स्थित सूरकुटी वह स्थान है जहाँ नेत्रहीन होने के बावजूद सूरदास ने अपनी अंतर्दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का ऐसा सजीव वर्णन किया, जो आज भी विश्व साहित्य में अद्वितीय है। संगीत के जानकारों के लिए यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सूरदास जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक महान संगीतज्ञ भी थे। उन्होंने अपने सवा लाख पदों की रचना अलग-अलग रागों में की थी।
कल आयोजित हुए इस भव्य समारोह का मुख्य उद्देश्य सूरदास जी की उसी संगीतमय विरासत को पुनर्जीवित करना था। कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसके बाद ब्रज के पारंपरिक शंखनाद ने उत्सव की शुरुआत की।
हवेली संगीत की विशेष प्रस्तुति
समारोह का मुख्य आकर्षण ‘हवेली संगीत’ की प्रस्तुति रही। यह गायन शैली पुष्टिमार्गीय संप्रदाय की एक विशिष्ट पहचान है, जिसे मंदिरों और हवेलियों में ठाकुर जी की सेवा के दौरान गाया जाता है। वाराणसी और वृंदावन से आए प्रख्यात गायकों ने जब ध्रुपद शैली में सूरदास के पद “मैया कबहुं बढ़ेगी चोटी…” और “मेरो मन अनत कहां सुख पावै…” का गायन शुरू किया, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए।
संगीत मनीषियों ने बताया कि सूरदास जी ने अपने पदों में राग सारंग, राग बिलावल, राग कान्हड़ा और राग केदारा जैसे जटिल रागों का प्रयोग किया है। कल की महफिल में इन रागों की शुद्धता को बनाए रखते हुए कलाकारों ने यह सिद्ध कर दिया कि शास्त्रीय संगीत और भक्ति का मेल ही मोक्ष का मार्ग है।
बाल कलाकारों की प्रतिभा और भविष्य की उम्मीद
इस वर्ष के आयोजन की सबसे सुखद तस्वीर यह थी कि इसमें आगरा और मथुरा के कई छोटे बच्चों ने भी भाग लिया। इन बाल कलाकारों ने ‘भ्रमर गीत’ के अंशों को अपनी मधुर आवाज में प्रस्तुत किया। संगीत की शिक्षा ले रहे इन नौनिहालों को सूरदास की परंपरा से जोड़ना आयोजकों की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आज के डिजिटल युग में, जहाँ बच्चे पश्चिमी पॉप संगीत की ओर भाग रहे हैं, उन्हें अपनी जड़ों और सूरदास जैसे महान संगीतकारों के बारे में बताना अनिवार्य है। सूरकुटी में आयोजित इस कार्यशालानुमा कार्यक्रम ने कई युवाओं को ब्रज भाषा और शास्त्रीय संगीत की ओर प्रेरित किया।
साहित्य और संगीत का अंतरसंबंध
समारोह के दूसरे सत्र में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसका विषय था— “सूरदास के पदों में शास्त्रीयता”। इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय और आगरा विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्षों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान यह बात उभरकर आई कि सूरदास ने संगीत को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि इसे ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम (नाद ब्रह्म) बनाया।
वक्ताओं ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आगरा के पास इतनी बड़ी विरासत होने के बावजूद, सूरकुटी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान नहीं मिल पाई है जो मिलनी चाहिए थी। उन्होंने सरकार से मांग की कि यहाँ एक ‘विश्व स्तरीय संगीत विश्वविद्यालय’ स्थापित किया जाए, जहाँ केवल सूरदास के पदों और ब्रज के संगीत पर शोध हो सके।
यमुना की अविरल धारा और संगीत की गूंज
समारोह का समापन संध्या के समय यमुना किनारे ‘महाआरती’ के साथ हुआ। जैसे ही दीयों की रोशनी यमुना के जल में झिलमिलाई, वैसे ही कलाकारों ने सामूहिक रूप से सूरदास का विदाई पद गाया। पूरा परिसर ‘राधे-राधे’ और ‘सूरदास जी की जय’ के उद्घोष से गूंज उठा।
यहाँ आए विदेशी पर्यटकों ने भी इस आध्यात्मिक संगीत का अनुभव किया। रूस से आई एक पर्यटक ‘ऐलेना’ ने बताया, “यद्यपि मैं भाषा नहीं समझती, लेकिन इन भजनों की लय में एक अलौकिक शांति है जो मन को शांत कर देती है। सूरदास की यह भूमि वाकई जादुई है।”
निष्कर्ष: विरासत को सहेजने की चुनौती
सूरकुटी का यह संगीत उत्सव हमें याद दिलाता है कि आगरा केवल ईंट-पत्थरों और स्मारकों का शहर नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, सुरों और अटूट भक्ति की धरा भी है। महाकवि सूरदास की यह विरासत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देती है। कार्यक्रम के अंत में संकल्प लिया गया कि प्रतिवर्ष इस उत्सव को और भव्य रूप दिया जाएगा और आगरा की गलियों में एक बार फिर सूर के पदों की गूंज सुनाई देगी।

