शीर्षक: शाहजहाँ की रसोई से मॉडर्न डीटूसी ब्रांड्स तक: जानिए आगरा के पेठे का इतिहास, मेकिंग प्रोसेस और असली पंछी पेठे का सच
विशेष फूड हिस्टोरियन व समीक्षक, आगरा
“आगरा आए और पेठा नहीं खाया, तो आपकी यात्रा अधूरी है।” यह जुमला ताजनगरी आने वाले हर मुसाफिर पर बिल्कुल सटीक बैठता है। ताजमहल के बाद यदि कोई दूसरी चीज है जो आगरा को पूरी दुनिया में पहचान दिलाती है, तो वह निश्चित रूप से यहाँ का ‘पेठा’ (Petha) है। बर्फ की तरह सफेद, पारदर्शी और चाशनी से लबालब भरा यह पेठा मुंह में जाते ही जिस तरह घुलता है, उसका कोई सानी नहीं है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक साधारण सी सब्जी—कद्दू (Ash Gourd/सफेद कद्दू)—से बनने वाली यह मिठाई मुगलों के दौर से लेकर आज के डिजिटल युग तक आगरा की अर्थव्यवस्था और खान-पान का सबसे बड़ा प्रतीक कैसे बनी? आइए, इस अद्भुत और रसभरी मिठाई के इतिहास, इसके बनने की वैज्ञानिक प्रक्रिया और इसके आधुनिक स्वरूप का पूरा जायजा लेते हैं।
मुगलिया इतिहास: शाहजहाँ के शाही बावर्चीखाने का आविष्कार
पेठे के जन्म को लेकर आगरा के गलियारों में कई लोककथाएं और ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। सबसे प्रामाणिक कहानी मुगल सम्राट शाहजहाँ के दौर से जुड़ती है। कहा जाता है कि जब ताजमहल का निर्माण चल रहा था और करीब 20,000 से अधिक कारीगर दिन-रात कड़ा श्रम कर रहे थे, तब वे रोज एक ही तरह का खाना (दाल-चावल और सूखी रोटियां) खाकर ऊब चुके थे।
कारीगरों की इस नीरसता को दूर करने और उन्हें तुरंत ऊर्जा (Instant Energy) देने के लिए शाहजहाँ ने अपने शाही बावर्चीखाने के मुख्य शेफ (खानसामा) को एक ऐसी नई मिठाई बनाने का आदेश दिया जो दिखने में ताजमहल जैसी शुद्ध सफेद हो, जल्दी खराब न हो और खाने में अत्यधिक ऊर्जावान हो।
खानसामा ने काफी शोध के बाद सफेद कद्दू को चूने के पानी में उपचारित कर और चीनी की चाशनी में पकाकर ‘पेठा’ तैयार किया। जब यह मिठाई कारीगरों को परोसी गई, तो उन्हें यह इतनी पसंद आई कि उनके काम की रफ्तार दोगुनी हो गई। यहीं से पेठे का व्यावसायिक सफर शुरू हुआ।
मेकिंग प्रोसेस: कद्दू से पेठा बनने का वैज्ञानिक सफर
पेठा बनाना कोई आसान काम नहीं है; यह एक बेहद धैर्यपूर्ण और श्रम-साध्य प्रक्रिया है जो कई चरणों से होकर गुजरती है:
- चयन और कटाई: सबसे पहले पूरी तरह से पके हुए भारी सफेद कद्दू (एश गॉर्ड) को चुना जाता है। इसके मोटे छिलके को उतारकर इसके भीतर के बीजों और मुलायम गूदे को पूरी तरह साफ कर दिया जाता है।
- गोदना (Pricking): इसके बाद कद्दू के वर्गाकार टुकड़ों को विशेष सुइयों से चारों तरफ से गोदा जाता है ताकि चाशनी इसके भीतर तक आसानी से प्रवेश कर सके।
- चूने के पानी का उपचार (Lime Water Treatment): गोदने के बाद इन टुकड़ों को कई घंटों तक चूने के पानी (Calcium Hydroxide) में भिगोकर रखा जाता है। चूने का पानी कद्दू के ढीले टुकड़ों को एक कड़क और ठोस (Crispy Structure) बनावट देता है।
- उबालना और चाशनी: अंत में, इन टुकड़ों को साफ पानी में अच्छी तरह धोकर चीनी की उबलती हुई चाशनी में तब तक पकाया जाता है जब तक कि वे पारदर्शी (Translucent) न हो जाएं।
‘पंछी पेठा’ (Panchi Petha) का भ्रम: असली दुकान की पहचान कैसे करें?
यदि आप आगरा की सड़कों पर निकलेंगे, तो आपको हर 10 मीटर पर ‘पंछी पेठा’ नाम का बोर्ड दिखाई देगा। कोई खुद को ‘असली पंछी’, कोई ‘ओरिजनल पंछी’, तो कोई ‘सच्चा पंछी’ पेठा बताता है। दरअसल, ‘पंछी पेठा’ आगरा का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित पेठा ब्रांड है, जिसकी शुरुआत स्वर्गीय श्री पंछी लाल जी ने की थी।
नकलचियों के इस जाल से बचने के लिए पर्यटकों को ध्यान रखना चाहिए कि असली पंछी पेठा की मुख्य और प्रामाणिक शाखाएं हरीपर्वत चौक (Hari Parvat) और सदर बाजार (Sadar Bazar) में ही स्थित हैं। असली दुकान की पहचान उनके पैकेजिंग होलोग्राम और निश्चित स्वाद से होती है।
आधुनिक बदलाव: अंगूरी, पान और चॉकलेट पेठे का दौर
आज का पेठा केवल पारंपरिक सूखे या केसरिया स्वाद तक सीमित नहीं है। बदलते वक्त और युवा पीढ़ी की पसंद को देखते हुए आगरा के पेठा निर्माताओं ने इसमें अद्भुत प्रयोग किए हैं:
- अंगूरी पेठा: चाशनी से भरा हुआ गोल-गोल छोटा पेठा जो अत्यधिक रसीला होता है।
- पान पेठा: पेठे की पतली परत के भीतर गुलकंद, सौंफ और इलायची की स्टफिंग करके इसे पान का आकार दिया जाता है।
- चॉकलेट और मैंगो पेठा: बच्चों और विदेशी पर्यटकों के बीच लोकप्रिय, जहां पेठे के ऊपर चॉकलेट की कोटिंग की जाती है।

