शीर्षक: कभी बसपा का अभेद्य किला रहा आगरा कैसे बना भाजपा का गढ़? जानिए वोटों के खिसकने की इनसाइड स्टोरी
विशेष राजनीतिक विश्लेषक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश की सियासत को गहराई से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि देश के राजनीतिक नक्शे पर आगरा की पहचान केवल ताजमहल की वजह से नहीं है। कांशीराम और मायावती के दौर में आगरा को गर्व से ‘बहुजन आंदोलन की धड़कन’ और ‘दलितों की राजनीतिक राजधानी’ कहा जाता था। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से प्रेरित इस धरती ने दशकों तक बहुजन समाज पार्टी (BSP) को वह वैचारिक और चुनावी ताकत दी, जिसके दम पर मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में, और विशेष रूप से हालिया लोकसभा व नगर निगम चुनावों के दौरान, आगरा की इस ‘नीली राजनीतिक जमीन’ पर एक बहुत बड़ा वैचारिक और चुनावी बदलाव आया है। कभी बसपा का अभेद्य किला माना जाने वाला आगरा आज भारतीय जनता पार्टी (BJP) का एक मजबूत और अजेय गढ़ बन चुका है।
स्थानीय निकायों में बसपा का गिरता ग्राफ: रनर-अप से आगे न बढ़ने की लाचारी
आगरा की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होते आधार को समझने के लिए सबसे सटीक पैमाना यहाँ के स्थानीय निकाय और नगर निगम के चुनाव हैं। अगर हम साल 2006, 2012, 2017 और पिछले साल 2023 में हुए आगरा नगर निगम के मेयर चुनावों के आंकड़ों और चुनावी नतीजों का विश्लेषण करें, तो एक बेहद दिलचस्प और चिंताजनक पैटर्न सामने आता है।
इन सभी चार लगातार चुनावों में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति ‘रनर-अप’ (दूसरे नंबर पर रहने वाली सबसे बड़ी ताकत) की रही। हर बार बसपा के उम्मीदवारों ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी और लाखों वोट हासिल किए, लेकिन वे कभी भी जीत की दहलीज (Victory Line) को पार नहीं कर सके। साल 2023 के पिछले नगर निगम चुनाव में भी बसपा उम्मीदवार ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन भाजपा की हेमलता दिवाकर ने उन्हें 1.13 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से शिकस्त देकर मेयर की कुर्सी पर कब्जा कर लिया। लगातार दूसरे स्थान पर सिमट जाने की इस लाचारी ने जमीन पर काम करने वाले बसपा के कार्यकर्ताओं के मनोबल को भारी ठेस पहुँचाई, जिसका सीधा असर बड़े चुनावों पर देखने को मिला।
लोकसभा चुनाव के आंकड़े: क्यों तीसरे नंबर पर खिसक गई बसपा?
स्थानीय निकाय के बाद जब देश का सबसे बड़ा चुनावी समर यानी आम चुनाव (लोकसभा) आया, तो आगरा में बसपा का ग्राफ बहुत तेजी से नीचे गिरा। साल 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों तक आगरा सीट पर बसपा का वोट शेयर लगभग 26% से 30% के बीच बना हुआ था, जो उसे मुख्य मुकाबले में रखता था। लेकिन पिछले चुनावों के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि अब आगरा की राजनीतिक बिसात पूरी तरह बदल चुकी है।
इस चुनाव में भाजपा के प्रो. एस.पी. सिंह बघेल को जहां करीब 5.99 लाख से अधिक (53% वोट शेयर) मत मिले, वहीं समाजवादी पार्टी (SP) के सुरेश चंद कर्दम ने 29.20% वोट शेयर के साथ 3.28 लाख से अधिक वोट हासिल कर खुद को आगरा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित कर लिया। दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी की उम्मीदवार पूजा अमरोही को महज 1.76 लाख वोटों (लगभग 15.70% वोट शेयर) के साथ तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। ‘दलित राजधानी’ कहे जाने वाले शहर में बसपा का इस तरह तीसरे नंबर पर खिसक जाना इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी का पारंपरिक और कोर वोट बैंक अब उनके पाले से खिसक रहा है।
भाजपा की कल्याणकारी योजनाएं और गैर-जाटव दलित कार्ड
राजनीतिक पंडितों के अनुसार, बसपा के इस बिखराव और भाजपा की निरंतर जीत के पीछे ‘कम्युtarget इंजीनियरिंग’ और ‘लाभार्थी कार्ड’ की एक बहुत बड़ी भूमिका है। भाजपा की रणनीति केवल ऊंची जातियों या पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने बसपा के सबसे मजबूत दुर्ग में प्रवेश करने के लिए ‘गैर-जाटव दलित’ (Non-Jatav Dalit) कार्ड खेला। भाजपा ने कोरी, वाल्मीकि, खटीक और धनगर जैसी जातियों को पार्टी के सांगठनिक ढांचे और टिकट वितरण में बड़ा प्रतिनिधित्व दिया।
इसके अलावा, केंद्र और राज्य की ‘डबल इंजन’ सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं—जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, मुफ्त राशन वितरण और आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना—ने जातियों के पुराने समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इन योजनाओं का सीधा लाभ गरीब और शोषित वर्गों को मिला, जिससे एक नया ‘साइलेंट वोटर वर्ग’ (लाभार्थी वर्ग) तैयार हुआ। इस वर्ग ने जातिगत बंधनों से ऊपर उठकर सीधे तौर पर भाजपा के पक्ष में मतदान करना शुरू कर दिया, जिससे बसपा का आधार कमजोर होता चला गया।
निष्कर्ष: ‘भाजपा बनाम सपा’ के नए द्विध्रुवीय (Bipolar) दौर की शुरुआत
आगरा की राजनीति का यह बदलता नैरेटिव यह साफ इशारा करता है कि आने वाले समय में यहाँ की चुनावी लड़ाई अब त्रिकोणीय नहीं रहेगी। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर होने और समाजवादी पार्टी के वोट शेयर में हुई बढ़ोतरी ने आगरा को एक नए ‘द्विध्रुवीय’ (Bipolar) राजनीतिक मैदान में तब्दील कर दिया है, जहां मुख्य मुकाबला ‘भाजपा बनाम सपा’ के बीच सिमटता जा रहा है।
अगर बसपा को अपनी इस खोई हुई ‘दलित राजधानी’ की साख को वापस पाना है, तो उसे अपनी पुरानी सोशल इंजीनियरिंग की नीतियों में अमूलचूल बदलाव कर नए युवाओं और स्थानीय चेहरों को आगे लाना होगा। अन्यथा, ताजनगरी की संकरी गलियों से फूटने वाले राजनीतिक सुर आने वाले समय में पूरी तरह से केसरिया और हरे रंग के समीकरणों के इर्द-गिर्द ही घूमते नजर आएंगे।

