आगरा लोकसभा सीट पर भाजपा का एकछत्र राज और प्रो. एस.पी. सिंह बघेल का बढ़ता कद

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विशेष राजनीतिक विश्लेषण: आगरा

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘ताजनगरी’ आगरा का एक बेहद विशिष्ट और रणनीतिक स्थान है। यह शहर जितना अपने संगमरमरी हुस्न ताजमहल और पेठे के लिए दुनिया भर में मशहूर है, उतना ही यह देश की अनुसूचित जाति (SC) आरक्षित राजनीति का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र भी माना जाता है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से आगरा (सीट संख्या-74) वह मैदान है, जहां का चुनावी परिणाम पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करता है। यदि हम यहाँ के हालिया चुनावी इतिहास और सियासी समीकरणों का विश्लेषण करें, तो एक बात बिल्कुल साफ होकर उभरती है—आगरा लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक ऐसा अपराजेय किला खड़ा कर लिया है, जिसे ढहा पाना विपक्षी दलों (सपा और बसपा) के लिए एक पहेली बन चुका है । साल 2009 से शुरू हुआ भाजपा की जीत का यह सिलसिला मौजूदा समय तक लगातार जारी है । इस मजबूत गढ़ को और अधिक ऊंचाई देने का श्रेय जाता है यहाँ के वर्तमान सांसद और केंद्र सरकार में प्रमुख चेहरा प्रो. एस.पी. सिंह बघेल को।

आगरा का राजनीतिक इतिहास: ‘दलित राजधानी’ से ‘भाजपा के गढ़’ तक का सफर

आगरा लोकसभा सीट के मिजाज को समझने के लिए इसके इतिहास के पन्नों को पलटना बेहद जरूरी है। एक दौर था जब आगरा को देश में ‘दलितों की राजनीतिक राजधानी’ के रूप में देखा जाता था। बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम और बाद में मायावती के दौर में इस सीट पर बसपा का सिक्का चलता था। लेकिन समय के साथ मतदाताओं की सोच और देश की राजनीतिक बयार बदली।

साल 2009 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट पर अपनी नई रणनीति के तहत कदम रखा और रामशंकर कठेरिया को मैदान में उतारा। कठेरिया ने न केवल वह चुनाव जीता, बल्कि 2014 की मोदी लहर में अपनी जीत के अंतर को और बड़ा कर दिया। इसके बाद साल 2019 में भाजपा आलाकमान ने एक बड़ा और चौंकाने वाला रणनीतिक दांव खेला। पार्टी ने रामशंकर कठेरिया को इटावा सीट पर भेज दिया और आगरा से उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल को टिकट थमा दिया। इस बदलाव ने विपक्ष के सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। प्रो. बघेल ने 2019 के चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार को 2.11 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी।

पिछले चुनाव के आंकड़े: बघेल की लोकप्रियता और विपक्ष का सूपड़ा साफ

पिछले आम चुनाव (2024) में विपक्ष को उम्मीद थी कि वे सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का फायदा उठाकर भाजपा के इस किले में सेंध लगा लेंगे, लेकिन प्रो. एस.पी. सिंह बघेल की जमीन पर पकड़ और भाजपा के मजबूत सांगठनिक ढांचे के सामने विपक्ष की सभी रणनीतियां धरी की धरी रह गईं।

चुनाव के नतीजों ने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया :

  • प्रो. एस.पी. सिंह बघेल (BJP): उन्हें कुल 5,99,397 वोट मिले, जो कुल मतदान का लगभग 53% से अधिक था [cite: 2.3.4]।
  • सुरेश चंद कर्दम (सपा): समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे, जिन्हें 3,28,403 वोट मिले ।
  • पूजा अमरोही (बसपा): बहुजन समाज पार्टी की उम्मीदवार को महज 1,76,474 वोटों से संतोष करना पड़ा, जिसके चलते वे तीसरे स्थान पर खिसक गईं ।

प्रो. बघेल ने 2,70,994 वोटों के एक ऐतिहासिक और प्रचंड अंतर से दोबारा जीत दर्ज की । इस जीत ने न केवल दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में बघेल का कद और मजबूत कर दिया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि आगरा की जनता का भरोसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और स्थानीय स्तर पर बघेल के काम पर अटूट है।

सभी 5 विधानसभाओं पर भाजपा का एकतरफा कब्जा

आगरा लोकसभा सीट की राजनीतिक ताकत और इसकी मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके अंतर्गत आने वाले सभी पांचों विधानसभा क्षेत्रों में विपक्ष का पूरी तरह से सूपड़ा साफ हो चुका है । इस संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाली पांच विधानसभा सीटें हैं:

  1. एतमादपुर
  2. आगरा कैंट (SC)
  3. आगरा दक्षिण
  4. आगरा उत्तर
  5. जलेसर (SC)

वर्तमान में इन सभी पांचों विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक काबिज हैं । जब केंद्र में सांसद, राज्य में मुख्यमंत्री और जिले के सभी विधायक एक ही दल के हों, तो उसे ‘ट्रिपल इंजन’ की राजनीतिक ताकत कहा जाता है। इसी अभूतपूर्व समन्वय के कारण केंद्रीय और प्रांतीय कल्याणकारी योजनाएं सीधे जमीन तक पहुंचती हैं, जिसका सीधा फायदा चुनाव के समय वोट बैंक के रूप में भाजपा को मिलता है

प्रो. एस.पी. सिंह बघेल का सियासी रसूख और कार्यशैली

प्रो. सत्यपाल सिंह बघेल (एस.पी. सिंह बघेल) केवल एक राजनेता नहीं हैं, बल्कि वे राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर भी रहे हैं। उनकी यही बौद्धिक पृष्ठभूमि उनकी कार्यशैली में भी झलकती है। वे जनता के बीच बेहद सुलभ रहने वाले नेताओं में शुमार किए जाते हैं। आगरा के स्थानीय लोगों का कहना है कि सांसद बघेल दिल्ली या लखनऊ में रहने के बजाय अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के सुख-दुख में सीधे शामिल होना पसंद करते हैं।

चाहे वह ताजनगरी के विकास के लिए बुनियादी ढांचा परियोजनाएं (Infrastructure Projects) लाना हो, ‘स्मार्ट सिटी’ के तहत आगरा का आधुनिकीकरण करना हो, या फिर गंगाजल परियोजना के जरिए शहर के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की वकालत करना हो—बघेल ने हर मोर्चे पर अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक क्षमता का लोहा मनवाया है। यही कारण है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी उन्हें हमेशा महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती रही हैं, जिससे आगरा का रसूख राष्ट्रीय स्तर पर बना रहता है।

सामाजिक समीकरणों की राजनीति: कैसे ध्वस्त हुआ ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का भ्रम?

विपक्षी दल अक्सर आगरा में ‘दलित-मुस्लिम’ या ‘जाटव-यादव’ सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे चुनाव मैदान में उतरते हैं। लेकिन भाजपा और प्रो. बघेल ने इस पारंपरिक जातिगत राजनीति का तोड़ ढूंढ निकाला है। भाजपा ने गैर-जाटव दलित जातियों (जैसे कोरी, वाल्मीकि, खटीक, धनगर) और अत्यंत पिछड़े वर्गों (OBC) को अपने पाले में लाकर एक ऐसा नया और मजबूत ‘साइलेंट वोट बैंक’ तैयार किया है, जो विपक्ष की हर रणनीति को नाकाम कर देता है।

इसके अलावा, केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना, आयुष्मान भारत योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी ‘लाभार्थी राजनीति’ (Beneficiary Politics) ने जातियों की दीवारों को तोड़कर सीधे गरीब और मध्यम वर्ग के वोटर्स को भाजपा के साथ जोड़ दिया है। इसी का नतीजा है कि हर चुनाव में भाजपा का वोट शेयर बढ़ने के साथ-साथ उसकी जीत का अंतर भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाता है [cite: 2.3.4]।

निष्कर्ष: भविष्य की राह और चुनौतियां

आगरा लोकसभा सीट पर वर्तमान में भाजपा और प्रो. एस.पी. सिंह बघेल की स्थिति भले ही बेहद मजबूत और अपराजेय दिखाई देती हो, लेकिन राजनीति में चुनौतियां कभी खत्म नहीं होतीं। आने वाले समय में शहर के बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करना, स्थानीय पर्यटन उद्योग को और अधिक वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देना और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना कुछ ऐसे बड़े मुद्दे हैं, जिन पर जनता की नजरें हमेशा बनी रहेंगी। बहरहाल, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखकर यह साफ कहा जा सकता है कि ताजनगरी का यह सियासी किला फिलहाल पूरी तरह से अभेद्य है और प्रो. बघेल इसके सबसे मजबूत सारथी बने हुए हैं

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