आगरा की ऐतिहासिक दरगाह पर सजी कव्वाली की महफिल

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मोहब्बत और इतिहास की नगरी आगरा की पहचान सिर्फ संगमरमरी ताज या लाल पत्थरों से बने किले तक ही सीमित नहीं है। इस शहर की रग-रग में संगीत, अदब और रूहानियत का एक ऐसा संगम बहता है, जो सदियों पुराना है। इसी सांस्कृतिक और संगीत की विरासत को समेटे हुए, कल रात आगरा के पुराने शहर के भीतरी इलाके में स्थित सूफी संत की ऐतिहासिक दरगाह पर सालाना उर्स के मौके पर एक अजीम-ओ-शान (विशाल) सूफियाना कव्वाली महफिल का आयोजन किया गया। यह आयोजन सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह आगरा की उस गंगा-जमुनी तहजीब और रूहानी विरासत का जीवंत प्रमाण था, जो आज के आधुनिक दौर में भी लोगों के दिलों को जोड़े हुए है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आयोजन की महत्ता

आगरा, जिसे कभी ‘अकबरावाद’ के नाम से जाना जाता था, सूफी संतों और संगीत के उस्तादों का गढ़ रहा है। हजरत अमीर खुसरो द्वारा शुरू की गई कव्वाली की विधा को इस शहर ने हमेशा अपने सीने से लगाकर रखा है। इस साल का उर्स और कव्वाली मुकाबला बेहद खास था क्योंकि इसमें न केवल आगरा के स्थानीय कलाम पढ़ने वाले फनकार शामिल हुए, बल्कि दिल्ली के निजामुद्दीन औलिया की दरगाह और लखनऊ के मशहूर घरानों के नामचीन कव्वालों ने भी शिरकत की।

शाम ढलते ही पूरी दरगाह रंग-बिरंगी रोशनी और लोबान (धूप) की खुशबू से सराबोर हो गई थी। महफिल का आगाज पारंपरिक रीति-रिवाजों और मजार शरीफ पर चादर पोशी के साथ हुआ। जैसे-जैसे रात परवान चढ़ी, दरगाह के सहन (आंगन) में सफेद चांदनी बिछाई गई और हारमोनियम, तबले व ढोलक की थाप के साथ सुरों का ऐसा कारवां शुरू हुआ, जिसने भोर की पहली किरण तक समां बांधे रखा।

महफिल का आगाज: खुसरो के कलाम और हम्द-ओ-नाअत

कार्यक्रम की शुरुआत स्थानीय कव्वाल भाइयों की टोली ने पारंपरिक ‘हम्द’ (ईश्वर की स्तुति) और ‘नाअत’ (पैगंबर की प्रशंसा) से की। शुरुआती सुरों ने ही वहां मौजूद सैकड़ों श्रोताओं को शांत और एकाग्र कर दिया। इसके बाद जब दिल्ली से आए उस्ताद कव्वालों के समूह ने मंच संभाला, तो माहौल पूरी तरह सूफियाना रंग में रंग गया।

उन्होंने सूफी संगीत के जनक कहे जाने वाले हजरत अमीर खुसरो का कालजयी कलाम “छाप तिलक सब छीनी रे तोसे नैना मिलाइके…” गाना शुरू किया। इस कलाम की एक-एक बंदिश पर उपस्थित जनसमूह झूमने लगा। ताली बजाने की थाप (जो कव्वाली की रीढ़ मानी जाती है) इतनी लयबद्ध थी कि दरगाह का पूरा परिसर एक अलग ही ऊर्जा से स्पंदित हो उठा। संगीत के जानकारों का कहना था कि कव्वालों ने जिस खूबसूरती से ‘आलाप’ और ‘तान’ का इस्तेमाल किया, उसने आगरा घराने की शास्त्रीय गायकी की याद ताजा कर दी।

कव्वाली का मुकाबला और सूफी संतों का संदेश

रात के दूसरे पहर में यह महफिल एक बेहद दिलचस्प कव्वाली मुकाबले (जवाब-ए-कव्वाली) में तब्दील हो गई। एक तरफ लखनऊ से आए फनकार थे, तो दूसरी तरफ आगरा के ही उभरते हुए युवा सूफी गायक। दोनों पक्षों के बीच शेरो-शायरी, सूफी कसीदों और रूहानी संवाद का ऐसा सिलसिला चला कि दर्शकों ने खड़े होकर कलाकारों का अभिवादन किया।

इस मुकाबले की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि गीतों के जरिए केवल मनोरंजन नहीं किया जा रहा था, बल्कि बाबा बुल्ले शाह, संत कबीर और ख्वाजा गरीब नवाज के विचारों को जनता के सामने परोसा जा रहा था। कबीर के दोहे “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ…” को जब कव्वाली के सुरों में पिरोकर गाया गया, तो पंडाल में बैठे हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह इस बात का प्रतीक था कि संगीत कैसे जाति, धर्म और मजहब की दीवारों को तोड़कर सीधे इंसान की रूह से संवाद करता है।

विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र

आगरा एक वैश्विक पर्यटन स्थल है, इसलिए इस महफिल का आकर्षण केवल स्थानीय निवासियों तक सीमित नहीं रहा। ताज महल और आगरा किला घूमने आए कई विदेशी सैलानी भी इस रूहानी शाम की कशिश से खुद को दूर नहीं रख पाए। फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका से आए पर्यटकों का एक दल देर रात तक दरगाह के एक कोने में बैठकर इस संगीत का आनंद लेता दिखा।

हालांकि वे भाषा (उर्दू और हिंदी) को पूरी तरह समझने में असमर्थ थे, लेकिन सूफी संगीत की लय, ऊर्जा और कव्वालों की भाव-भंगिमाओं ने उन्हें पूरी तरह सम्मोहित कर रखा था। फ्रांस से आए एक पर्यटक ‘जूलियन’ ने बातचीत में कहा, “मुझे शब्द समझ नहीं आ रहे हैं, लेकिन इस संगीत में एक अजीब सी कशिश और शांति है, जो सीधे दिल को छूती है। यह भारत की असली रूह है।”

लुप्त होती विधा को बचाने का संकल्प

इस भव्य आयोजन के पीछे शहर के कुछ प्रबुद्ध नागरिकों और सांस्कृतिक संस्थाओं का बड़ा हाथ रहा। कार्यक्रम के मुख्य आयोजक और दरगाह के खादिम ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि आज के दौर में जब रील्स और रैप संगीत का बोलबाला है, पारंपरिक कव्वाली और शास्त्रीय सूफी संगीत कहीं न कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

उन्होंने कहा, “हमारा मकसद केवल एक रात का जलसा करना नहीं है। हम चाहते हैं कि आगरा की युवा पीढ़ी इस बात को समझे कि कव्वाली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इबादत (प्रार्थना) का एक जरिया है। हमें खुशी है कि इस बार दर्शकों में बड़ी संख्या युवाओं की थी, जो यह साबित करती है कि अगर अच्छा और सच्चा संगीत परोसा जाए, तो आज की पीढ़ी उसे जरूर पसंद करेगी।”

भोर की पहली किरण और दुआ के साथ समापन

जैसे-जैसे रात ढली और सुबह की ठंडी हवाएं चलने लगीं, महफिल अपने अंतिम पड़ाव ‘रंग’ पर पहुंची। हजरत निजामुद्दीन औलिया के पसंदीदा कलाम “आज रंग है ऐ मां रंग है री…” के गायन के साथ पूरी महफिल का जोश चरम पर पहुंच गया। सभी कव्वाल और श्रोता अपनी जगहों पर खड़े हो गए और पूरा माहौल तालियों और ‘अल्लाह हू’ के नारों से गूंज उठा।

अंत में, देश में अमन-चैन, भाईचारे और खुशहाली के लिए विशेष दुआ मांगी गई। सुबह की अज़ान के साथ इस ऐतिहासिक और रूहानी संगीत यात्रा का समापन हुआ। आगरा की इस दरगाह पर सजी यह महफिल इस बात की गवाह बनी कि वक्त भले ही बदल रहा हो, लेकिन ताजनगरी के दिलों में आज भी सूफियाना सुरों और मोहब्बत की वही तड़प जिंदा है, जो सदियों पहले हुआ करती थी।

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